इतनी नफरत, इतनी हिंसा
इतनी नफ़रत इतनी नफ़रत इतनी नफ़रत आखिरी कितनी नफ़रत? इससे नफ़रत उससे नफ़रत उससे नफ़रत आखिर किस किससे नफ़रत? इतनी हिंसा इतनी हिंसा इतनी हिंसा आखिर कितनी हिंसा?
Pratibha Katiyar is a Hindi Writer, Poet, Journalist in India.
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नवीन जोशी- सघन संवेदनाओं और सामाजिक-राजनैतिक चेतना से सम्पन्न प्रतिभा कटियार कविताओं के अलावा कहानियां भी लिखती रही हैं। रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी 'मारीना' में कविता एवं कवि-मन की उनकी समझ के साथ उनके गद्य ने भी ध्यान खींचा था। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका पहला उपन्यास 'कबिरा सोई पीर है' भी प्रकाशन के बाद से चर्चा में है। भारतीय समाज में गहरे पैठी वर्णाश्रमी संरचना और उससे उपजी मारक…

उदास आँखों को उस रोज़ धुंध से भरी एक सड़क पर रख दिया था। वही सड़क जिसे दूर से टुकुर-टुकुर देखा करती थी। वही सड़क जो अक्सर ख़्वाबों में आती थी और हाथ पकड़कर उठाकर ले जाती थी। आखिर एक रोज़ धुंध से भरी उस सड़क पर पाँव रख दिये। ख़्वाब में दिखने वाली सड़क पर जब हक़ीक़त में पाँव रखे तो जैसे दिल के सीले कोनों को तनिक रोशनी मिली हो। उम्र का कुछ न कहिए ये न जाने कितने परतों में रूप बदल बदल कर रहती है। अचानक से मैंने…

- दिनेश कर्नाटक कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर। जो पर पीर ना जानई, सो काफिर बे पीर। (कबीर कहते हैं, जो दूसरे की पीड़ा को समझ सके, वही साधु- संत है, जो न समझ सके वह धर्म तथा हृदय हीन है।) कबीर के दोहे की पंक्तियों से ही प्रतिभा कटियार ने अपने उपन्यास का नाम 'कबिरा सोई पीर है' रखा है, जो लोकभारती पेपरबैक्स से वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में जातिवाद के नाम पर भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न की…
इतनी नफ़रत इतनी नफ़रत इतनी नफ़रत आखिरी कितनी नफ़रत? इससे नफ़रत उससे नफ़रत उससे नफ़रत आखिर किस किससे नफ़रत? इतनी हिंसा इतनी हिंसा इतनी हिंसा आखिर कितनी हिंसा?

शिलॉन्ग से सोहरा की यात्रा शुरू हो चुकी थी। उत्साह, खुशी और गहरी शांति का हाथ थामे हम माँ बेटी निकल पड़े थे। यूं हम जानते तो थे कि सफ़र सुहाना होने वाला है लेकिन असल मजा उस जाने हुए के पार जाने का है। यात्राओं की सबसे सुंदर बात लगती है कि हमेशा कोई न कोई चौंकाने वाला मंजर यात्राओं के पास होता है। हमारे तमाम जाने हुए से, सोचे हुए से अलग कुछ अनोखा। जैसे कोई बंद मुट्ठी हो, जिसके खुलने का इंतज़ार हो। रात…

ये शिलांग की सुबह है। इस सुबह में बीते दिन की पूरी धमक है, बीती शाम की सरगोशियां हैं, चमक है। सुबह की सैर पर निकली तो चलती ही गई, मानो शिलांग को अपने कदमों से भी जीना चाहती हूँ। किसी भी शहर की सुबह में उसकी रात की कहानी का पता होता है। बस उस पते का पता पूछने वाले कम ही होते हैं। अपने चलते हुए कदमों और दृश्यों में छुपी शहर की बतकही से मुख़ातिब थी। वही चाय का उठता धुआँ, कुछ घूमने निकले जोड़े, कुछ…

रिश्ता तो जुड़ चुका था। हम शिलॉन्ग पहुंच चुके थे। एक दिन में जैसे न जाने कितने दिन जी लिए थे हमने। कोई दिन ऐसे होते हैं कि जी करता है ख़त्म ही न हों। हम ऐसे दिनों को आस से देखते हैं बिना कुछ कहे, और कभी-कभी वो हमारी आँखों की सुन लेते हैं। यह ऐसा सा ही दिन था। और अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था। कमरे पर पहुंचे तो चाय की जबर्दस्त तलब लगी, और जब चाय होगी तो पकौड़े तो लाज़िमी हुए। कुछ देर आरामदेह बिस्तर में धँसे…

1998 में रिलीज हुई फिल्म 'सत्या' के एक गाने की यह लाइन कि 'मैंने तेरे लिए मौसम मंगाया है, तेरे लिए रस्ता बिछाया है...' इतनी ज्यादा अच्छी लगती थी कि ऐसा लगता काश कोई यह कहे मुझसे भी। रूमानियत वाले ऐसे ख़्वाबों की जिंदगी ने कायदे से बैंड बजाई और यह समझाया कि अपनी ख़्वाहिशों को किसी के भरोसे मत छोड़ो, खुद पकड़ो उनकी बागडोर और निकल पड़ो बस... प्रकृति के क़रीब जाकर हमेशा यह महसूस हुआ है कि मेरे मन का वह…

तस्वीर इन्टरनेट से साभार यह इतवार की सुबह है। जाने कहाँ से इतना सारा तनाव आ गया है। लंबे समय से एक चिड़चिड़ाहट तारी है जिसे फुल इगनोर करने पर लगी हूँ। यह चिड़चिड़ाहट रसोई से है, घर के कामों से है। बचपन से रोज सुबह आँख खुलते ही किचन में काम करते हुए माँ को ही देखा था। मैं ठीक से जग भी नहीं पाती थी कि आधा खाना बन चुका होता था। चूंकि मेरी माँ भी वर्किंग रही हैं, उनकी घड़ी और उनकी गति के बीच समायोजन के बीच…
अकसर जो चीज़ें अच्छी नहीं लगतीं उनके बारे में बात नहीं करती। देखने में टाइम वेस्ट करने के बाद उसके बारे में बात करके और टाइम क्यों वेस्ट करूँ आखिर। लेकिन हमारी फिल्मची दोस्त ज्योति नन्दा ने कहा, कुछ तो लिखो तो लिख रही हूँ। ज्योति की ही पिछली पोस्ट से बात शुरू करती हूँ। नीयत। जिसे समझ और अप्रोच भी कह सकती हूँ। फिल्म बनाने के पीछे की नीयत क्या है, और देखने वाले की नीयत क्या है। यहीं से सारी बात शुरू…