फ़ोन की स्क्रीन पर साँप बिंदुओं का पीछा करते करते थक गया था, अस्पताल की ठंडी बैंच ने नींद से लाल आँखों को जगाए रखा था, पर भैया का कोई कॉल नहीं आया, उन्हें यहाँ होना चाहिए था, वो नहीं होंगे तो पापा से बात कौन करेगा? उन्हें सम्भालेगा कौन? मैं अस्पताल तक पापा को लेकर तो आ गया पर रात भर उनके पास बैठना मेरे बस की बात नहीं है।अस्पताल के इस मेन हॉल में कहीं भी बैठो, बार बार ध्यान उन तीन पेंटिंग्स पे जाता था जो सालों से वहीं के वहीं टंगी थी। अस्पताल के भारी-भरकम लकड़ी के दरवाज़े के ठीक ऊपर।आज़ादी के कुछ समय पहले ही इस मिशनरी अस्पताल का निर्माण हुआ था, ग़रीबों के लिए। ऊँची छत, सागौन के पिल्लर और लाल अंग्रेज़ी कवेलू से ढँका मेन एंट्रेंस, नये-नये हिस्सों का कंस्ट्रक्शन होता रहा पर जो सड़क से दिखता वो यही दिखता था। गुलमोहर के पेड़ों के बीच चुप-चाप खड़ा ये अस्पताल। पेंटिंग में ईशू का सफ़ेद लबादा और शांत आँखें, दूसरी पेंटिंग में मैरी, उन्होंने शांत सफ़ेद कपड़ों पर नीला लबादा ओढ़ा हुआ था, इन दोनों के बीच में जो पेंटिंग थी उसे कभी कहीं और नहीं देखा-एक लड़का अपने घुटनों पर झुका है, उसकी पीठ दिखती है, उसके कपड़े फटे हुए हैं, मैले हैं। वो एक बूढ़े आदमी से लिपटा हुआ है, ऐसे जैसे आदमी के पैरों को कभी नहीं छोड़ेगा। पेंटिंग में और भी लोग हैं- वे सभी बूढ़े आदमी और उसके पैरों में लिपटे हुए लड़के को देख रहे हैं । बस इन्ही तीन पेंटिंग को देखते-देखते किसी को भी एक अच्छी नींद आ सकती है। बग़ल में बैठा आदमी बार-बार बाहर जाकर बीड़ी पी कर वापस आता और बग़ल में बैठ कर बग़ल का आदमी बन जाता! उसके पैर एक जगह रुकते ही नहीं, कभी झुक कर सर खुजाता, कभी उँगली में पहनी अंगूठी घुमाता। उसका और मेरा समय अलग वेग से चल रहा था, मैं जैसे बैठा था वैसे ही बैठा था, थोड़ा भी हिलता तो शरीर में दूसरी जगह ठंड महसूस होती।
नर्स मैरी के जूतों की आवाज़ हॉल में गूंजी। हॉल ख़ाली नहीं था, कम से कम बीस से तीस लोग बैठे हुए थे पर सब दुबके हुए, एक दूसरे से सट कर बिल्कुल ही चुप!हाल की कम रोशनी में बस रंग-बिरंगे कंबल, शॉल और लोगों के सर दिखायी दे रहे थे। चप्पल में पाँव रहना नहीं चाह रहे थे, चाह रहे थे कि किसी गरम जगह भाग जायें। अस्पताल की ऊँची छत से लटकते लंबे पंखे और डिम ट्यूबलाइट, जो कभी एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ते, ऐसे लगते जैसे हताश प्रेमी हों । पुराने अस्पताल में उजाला रखने की जितनी भी कोशिश करो, अंधेरा अंधेरा ही लगता है।बग़ल में बैठा आदमी खड़े होकर बाहर जाने को हुआ, फिर कुछ सोच कर बैठ गया। बंडल दिखा कर बोला “इतनी ठंड है बाहर, बार-बार जाना पड़ता है, यहीं पीने देना चाहिए”।सिस्टर मैरी मेरी तरफ़ ही आगे बढ़ रही थी, उस आदमी ने अपना बंडल पीछे कर लिया वो आयी और एक कंबल मेरे हाँथों में दे गई “इसको ओढ़ लो, नहीं तो तुम्हारे फादर के बाजू में तुमको भी एडमिट करना पड़ेगा” ऐसा कह के वो फिर व्यस्त हो गई मैंने कंबल में ख़ुद को लपेट लिया, आदमी ने पूछा “आपको जानती हैं?” मैंने हामी भरी। वह आदमी फ़िर बाहर जाने को हुआ तभी अस्पताल के किसी कमरे से बच्चे के पहले रोने की आवाज़ आयी, वो ठिठका और मैटरनिटी वॉर्ड की ओर दौड़ा, नोटों का एक बंडल उसकी जेब से उछल कर बाहर गिरा, एक पेन, और बहुत सारी चिल्लर भी साथ में गिरी। सिक्कों के फ़र्श पे गिरते ही सभी लोगों में एका-एक जान आ गई, सब इधर-उधर देखने लगे। उसने झुक कर जल्दी से नोट का बंडल उठाया, माथे पे छुआ कर जेब में रख लिया, फिर झुक कर जल्दी-जल्दी सिक्के बटोरने लगा ।सिस्टर मैरी, जो ये सब घटते हुए देख रही थी, उस आदमी पर चीख पड़ी “तुमको बेबी हुआ है और तुम चिल्लर उठा रहा है, चिल्लर बाबा उठा देगा, जाओ लेबर रूम के बाहर वेट करो” । सिस्टर मैरी ने मेरी ओर देखा, मैं तुरंत उठ कर चिल्लर उठाने लगा, उस आदमी ने एक नज़र मेरी और भरपूर भरोसे से देखा और फिर अपनी क़मीज़ की जेब पर हाँथ रख कर भागा। क़मीज़ की जेब पर हाँथ रख कर भागता आदमी ज़िम्मेदार दिखायी देता है, ऐसे आदमियों को भागते हुए देखो तो लगता है कि ये किसी की मदद करने ही भाग रहा है, या किसी का छूटा हुआ कुछ लौटाने।
फ़ोन अचानक वाइब्रेट हुआ, भैया का कॉल आया और कट गया।
बाहर जाकर, फ़ोन पर भैया से बात हुई । उन्होंने बताया कि कोहरे के कारण ट्रेन-बस सब बंद हैं, पहुँचना मुश्किल होगा, उन्हें जब पता चला कि पापा को मैं अपने ऑटो में बैठा कर ले आया हूँ तो भड़क गये! आख़िरी में बस इतना कहा की सुबह स्थिति बेहतर हुई तो कार से पहुँचेंगे। एम्बुलेंस की लाल बत्ती धुँध में दिखायी दे रही थी। एम्बुलेंस से ड्राइवर चिल्लाया
“ऑटो किसका है, हटाओ ?”
मैंने तुरंत ऑटो को रिवर्स किया, बावीस किलोमीटर ऑटो चलाने से कलाइयों का जोड़ दुख रहा था।
आदमी मुझे मेरी और आता दिखायी दिया, उसके हाव भाव एकदम शांत थे, एक मुस्कुराहट थी उसके चेहरे पर
“बाप बन गया मैं भैया”
मैंने मुस्कुरा कर उसे बधाई दी
“एकदम हैल्दी हुआ है”
“माँ ठीक हैं ?”
“माँ तो एकदम बढ़िया हैं, कल आयेंगी, बाबू जी के साथ” उसने बीड़ी होंठ में दबाते हुए कहा, फ़िर पूछा “आप जानते हैं माँ को?”
“बच्चे की माँ, आपकी पत्नी?” उसके चेहरे पर हंसी उमड़ आयी
“वो भी एकदम बढ़िया, अभी बेहोशी में है, नैचुरल हो गया सब कुछ”
“पूरा रेस्ट करने के बाद ही डिस्चार्ज करना” उसने हाँ में गर्दन हिलायी और ऑटो को देखते हुए पूछा
“ऑटो आपका ही है”
“जी”
“अच्छा!”
मैंने जेब से उसके सारे सिक्के निकाले और लौटा दिये, उसने गिने और उत्साहित होकर कहा ‘इक्कीस रुपये निकले हैं भैया”पास के ही पीपल के पेड़ के नीचे एक शिव लिंग रखा हुआ था और गणपति की फोटो एक डाल पे टंगी थी, उस आदमी ने इक्कीस रुपये चिल्लर वहीं चढ़ा दिये और भगवान के, पेड़ के, इस सारी सृष्टि के हाँथ जोड़े क्योंकि आज वो पिता बन गया था।मैं अंदर पहुँचा तो सिस्टर ने बताया की पापा को ठीक लग रहा है, उन्हें जनरल वार्ड शिफ्ट कर दिया है। कमरे में लगे दो दर्जन बिस्तरों में से एक पर पापा लेटे हुए थे। मैं उन्हें दूर से देख रहा था, मौजूद स्टाफ ने अंदर आने का इशारा किया। मैं पापा के पास जाकर खड़ा हुआ, स्टाफ़ नर्स ने कहा “मास्टर जी, बेटा खड़ा है आपका सामने”
उन्होंने बंद आँखों से ही कहा
“अरुण! कब आया!”
“मैं हूँ”
आवाज़ सुन के पापा थोड़ी देर कुछ नहीं बोले, उन्होंने आँखें बंद ही रखी
“बहुत कोहरा है, वो नहीं आ पायेंगे, मैं हूँ यहीं।” थोड़ा रुक कर मैंने आगे पूछा “ठीक लग रहा है?"
धीरे-धीरे पूरा दर्द चला जाएगा, स्टाफ नर्स ने बताया- अभी थोड़ी देर में खिचड़ी खिलाइयेगा । ध्यान रखिएगा, कोई सडन मूवमेंट नहीं, करवट पे नहीं सोना है, तीखा, मसालेदार एकदम नहीं खाना है, जितना आराम करें उतना अच्छा! मैं बैड के पास एक स्टूल पर बैठ गया, “ठीक लग रहा है?” मैंने सवाल वापस दोहराया उन्होंने एक अनमने से हाँ का इशारा किया“अरुण तो बोला था कि आ जायेगा” पापा बुदबुदाये
“रात भर तो यही रहना है, कल सुबह तक ज़रूर आ जाएँगे। फिर अपनी कार से आपको ले जाएँगे!”
“ठीक है”
“कुछ खाएँगे?”
“नहीं”
एक साफ़ सुथरा “नहीं",
कुछ लोग आकर पापा को देख उनके सामने रुक जाते, यहाँ के लोकल स्टाफ़ में से बहुत से लोग पापा के स्टूडेंट रहे हैं। मैं इस शहर में जहां भी जाता हूँ वहाँ पापा के स्टूडेंट मिल जाते हैं। पापा एक बहुत ही चहेते टीचर रहे, कमाल के पति पर ज़रूरत से ज़्यादा स्ट्रिक्ट बाप रहे, उन्होंने हमेशा यही कोशिश की जितनी भी वैल्यूज़ और एथिक्स एक इंसान में डाली जा सकती हैं उनके दोनों बेटों में आ जायें।
भैया उनकी मौरल लैब के चिम्पांज़ी थे।
स्वतंत्रता दिवस पर पापा उन्हें स्पीच लिख कर देते, भैया पूरा स्पीच याद करते, फ़िर बुलंद आवाज़ में माइक के सामने बोलते, मैं भारत माता की जय के नारे सबसे ऊँची आवाज़ में लगाता था। कहीं भी हों अगर राष्ट्र गान बजता तो भैया अपनी जगह पर ही खड़े हो जाते थे, पापा ने उन्हें समझाया था कि अगर कहीं राष्ट्र गान बज रहा हो और उसी समय तुम्हारे शरीर पे साँप भी लिपट जाये तो भी सावधान की स्थिति में खड़े रहना है, कई बार मैंने उनके हिस्से की आइसक्रीम राष्ट्रगान गाकर उनसे छीनी है, वो आईसक्रीम खा रहे होते और मैं जन-गण-मन गाना शुरू कर देता था। वो सीधे खड़े हो जाते और मैं राष्ट्रगान गाते गाते उनकी आईसक्रीम खा जाता था, वो मुझे ग़ुस्से में आतंकवादी कह कर मेरे पीछे भागते फिर मैं उन्हें गांधी की बातें याद दिलाता, मुझे मारने के लिए उनका उठा हुआ हाँथ हवा में ही रुक जाता।उनका टिफ़िन स्कूल से ऐसे साफ़ होकर आता था जैसे उसमें कुछ रहा ही नहीं हो, मेरे टिफ़िन से रेत-कंकड़-पत्थर-मरी हुई तितलियाँ, ये सब निकलता था । दोनों भाई जब स्कूल से साथ लौटते थे तो कहना मुश्किल था की हम दोनों भाई हैं, सफ़ेद क़मीज़ पर तेल के दाग, फटी हुई जुराबें, खुले हुए फ़ीते, लड़ाई-झगड़े में खड़े हुए बाल। भैया वैसे ही लौटता था जैसे वो स्कूल जाता था, वैसा ही, भैया दुनिया की सबसे सुंदर मूर्ति जैसा था और मैं अखंड वाहियात शैतान। पागल बंदर, भूखा भालू, ज़हरीला साँप।मुझे कभी कोई मेरे मदारी से छुड़ाने नहीं आया।परीक्षा के बाद भैया की एग्ज़ाम-कॉपीज़ पूरे स्कूल में दिखायी जाती थी। पचास में से उनचास नंबर, एक नंबर इसलिए कटता क्योंकि पूरे नंबर देने में टीचर्स को हिचकिचाहट होती, पापा के कहने पर उनकी कॉपियों की जाँच दो-तीन बार होती, मैं भी उसी स्कूल में था-एक औसत छात्र, अपने साथ अपने दोस्तों की दुनिया में खोया, रोज़ असेंबली में पापा को देखता, अपने भाई को देखता जो स्टेज पर चढ़ कर पूरी असेंबली को सावधान और विश्राम के निर्देश देता था।
भैया स्कूल से घर पहुँचते ही हाँथ-मुँह धोकर पढ़ने बैठ जाता, और मैं दोस्तों से उधार लायी कॉमिक्स और मैगज़ीन पढ़ता। मैंने किसी को कभी बताया नहीं, पर मैंने एक कहानी लिखनी शुरू कर दी थी, जिसमें शब्दों के साथ साथ मैं चित्र भी बनाता था । “भालू का बदला” नाम था उस कहानी का- जिसमें एक भालू, मदारी से अपने बच्चों को छुड़ाने जाता है, भालू को पता है कि वो मदारी की बंदूक़ का सामना नहीं कर पाएगा, इसलिए भालू अपने साथ एक झोले में कुछ छुपाकर लाया है। भालू और मदारी का आमना-सामना होता है, मदारी ने बंदूक़ भालू पे तान दी है तभी भालू अपना झोला उलट देता है और उस से निकलती है मधुमक्खियों की सेना, जो मदारी को एक सेकंड में ही अपने डंक से हज़ार गोलियाँ मारती हैं। भालू अपने बच्चों के साथ जंगल वापस लौट जाता है। मदारी तड़पता रहता है अंत तक, जब तक दुनिया ख़त्म नहीं होगी, तब तक। मुझे बचपन से ही चित्र उकेरना पसंद था, पेंटिंग जैसा नहीं, पेंसिल से बनायी रफ़ एचिंग्स। अख़बारों में नेताओं के नाक पे लौंग बनाता था और बिंदी लगाता था, कोलगेट के ऐड में छपे मॉडल के सफ़ेद दांत काले कर देता था, सनी देओल और मिथुन की उघाड़ी छाती पे ब्रा बना देता था। भैया की एकदम सफ़ेद ज्योमेट्री की नोटबुक में मैं अख़बारों के विज्ञापनों से देख-देख कर हूबहू - मोटर साइकिल बनाया करता था। भैया ने पापा से मेरी शिकायत की, पापा ने जब मेरे बनाये चित्र देखे तो देखते ही रह गये।
“ये तो तुम अच्छा बनाते हो?”
मुझे लगा पापा ने मुझे गोद में उठा कर चूम लिया हो, मेरे पाँव पेड़ों के ऊपर थे और हाँथ तारों के नीचे- मैंने पापा से कहा की क्या आप मेरे लिये “ऑटो ड्राइव” नाम की मैगज़ीन ला देंगे, पापा ने कहा था बिलकुल ला देंगे। उस दिन से हर महीने वो मैगज़ीन मुझे महीने की दस बारह तारीख़ को मिल जाती थी। वो मैगज़ीन पापा लगभग दुगने दाम देकर, नागपुर के किसी बुक स्टोर से कोरियर से मँगवाते थे। आज भी मेरी हिसाब डायरी में मेरे रिक्शास्टैंड के हर ऑटो ड्राइवर का चेहरा, शहर की मोटर-सायकिलें, कहीं किसी कोने में बनी मिल जाएगी । एक पेंसिल आज भी जेब में रहती है। शायद कक्षा छटवी में रहा होऊँगा, पापा के कहने पर हाई स्कूल के बच्चों के लिए लाइब्रेरी में अंग्रेज़ी अख़बार आने लगे थे, उन्हें पढ़ना कम्पलसरी था। मैं और मेरे दोस्त उसमें छपी हीरोइनों की फोटो चुप-चाप काट लिया करते थे, स्कूल ग्राउंड के इर्द-गिर्द पड़े मिलते कंडोम के डब्बों से हम उस पर बने पोस्टर फाड़ लेते, मैं और मेरे कुछ दोस्त, इन तस्वीरों को चुप-चाप जाकर स्कूल टॉयलेट में चिपका देते थे। असेंबली में इस बात की चर्चा थी, टीचर और स्कूल स्टाफ रोज़ बाथरूम से ये पोस्टर हटाया करते।लाइब्रेरियन ने एक बार मुझे और मेरे दोस्त को लाइब्रेरी से निकलते हुए रोका और जब हमारी जेबें चैक की तो उसमें वो ऐक्ट्रेसेज़ की तस्वीरें निकली। लाइब्रेरियन ने ये बात डरते-डरते पापा को बतायी थी, उन्हें ये भी आश्वासन दिया की उन्होंने ये किसी और को नहीं बताया है । पापा ने अगले दिन असेंबली में कहा कि जो भी बच्चे ये घिनौनी हरकत कर रहे हैं, उन्हें मौक़ा दिया जाता है कि वो ख़ुद से बाहर आ जाये। मैं और मेरा दोस्त एक दूसरे को देखते खड़े थे। उस समय मैं अपने पापा को इतना कुछ महसूस करा सकता था जितना मेरे बड़े भाई ने कभी नहीं कराया, मैं चुपचाप स्टेज पर आकर खड़ा हो गया। पापा बस मुझे देखते रहे, कुछ बोल ही नहीं पाये, उनकी नज़रें नीचे झुक गई । मैं उन्हें एकटक देख रहा था।
पहली बार मुझे लगा था कि मैं मैटर करता हूँ। उस दिन मैं दुनिया की हर यातना सहने के लिए तैयार था, एक तमाचे- दो तमाचे, लात घूसे सब कुछ, पर पापा ने कुछ ऐसा किया जो आजीवन मेरे साथ रहेगा
पूरे स्कूल के सामने वो अपने घुटनों पर झुके और मेरे स्तर पर आये- उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मेरे अंदर देख रहे हों । पूरी असेंबली शांत खड़ी थी, उन्होंने पूछा -“क्या तुम अपनी गलती मानते हो?” मैंने थूक गटका । मेरे हाथों में माइक थमाया गया, माइक में मैंने सब कुछ क़बूल कर लिया, अपने दोस्त का नाम नहीं लिया, पापा जिस कैंची से नाक के बाल काटते थे उसी कैंची से हम अख़बार की उन तस्वीरों को काटा करते थे। मैंने कैंची पापा को लौटा दी, तब समझ नहीं आया था पर मैंने उस दिन बहुत हल्का महसूस किया था-मैंने तीन सौ चार सौ लोगों के सामने अपनी शर्म क़बूल की थी। ऐसा क़बूलनामा आपको हल्का करता है, आंसू तो उस बात के आते हैं की अब लोग आपके बारे में क्या सोचेंगे? मेरे बारे में वैसे ही कोई कुछ नहीं सोचता था, और मैं धीरे धीरे वो इंसान भी बनते जा रहा था जिसके बारे में कभी कोई कुछ सोचेगा भी नहीं। अरुण भैया ने मुझसे उस दिन से बात बंद कर दी थी। घर आकर माँ को सब बताते हुए पापा रोये थे, मैंने कमरे से सुना था। वो बनियान पहने बैठे थे, उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी, बनियान पे हुए सारे छेदों को देखो तो एक आश्चर्यचकित चेहरा दिखायी देता था, माँ खिड़की के पास चुप खड़ी थी, पापा उन्हें बता रहे थे या उनकी मौजूदगी में स्कूल की घटना ख़ुद को दोहरा रहे थे, ये नहीं जानता।
“किसी भी बेटे को अपने पिता को रोते हुए नहीं सुनना चाहिए, वहाँ से बहुत दूर चले जाना चाहिए।”
आँठवी नौवीं की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मैं सिगरेट पीने लगा था।शहर के दूसरे स्कूल के ग्यारहवी -बारहवीं कक्षा के लड़कों से मेरी यारी दोस्ती हो गई थी।फ्रिज के ऊपर बिछे अख़बार के नीचे रखी चिल्लर, माँ के बाज़ार ले जाने वाली पर्स में बचे पाँच के नोट, पापा की जेब में रखे नोटों में से एक नोट, इन सब में मेरी ज़िंदगी चलने लगी। अमीर दोस्तों के पास मोटर साइकिल थी, अंग्रेज़ी फ़िल्म देखने के बाद हम दोस्त तेज़ रफ़्तार में मोटर साइकिल चलाया करते थे, शहर के बाहर एक आधी बनी पक्की सड़क थी, उस पर स्टंट करते थे।स्कूल से थोड़ी दूर एक पान-बीड़ी की गुमठी थी, उसमें पीछे टाटपट्टी डाल कर एक जगह बनायी गई थी। हम वहीं सिगरेट पीते थे, बारिश हो रही थी मैं अपने नये दोस्तों के साथ वहीं बैठा था, उनमें से अधिकतर मुझसे उम्र में बड़े थे, ये सभी शहर के एक बदनाम स्कूल के बच्चे थे जहां आये दिन टीचरों को कूट दिया जाता था।
सिगरेट के धुएँ में सब धुंधला था।हवा बहुत तेज चल रही थी, दुकान का टाट उठ-उठ कर नीचे अपनी जगह पे बैठ जाता। पेड़ झुक रहे थे। तेज़ बारिश से बचते हुए एक छाते के नीचे दो आदमी वहीं पहुँचे, उन्होंने अंदर घुसकर छाता बंद किया। पापा अपने किसी सीनियर के साथ थे। उन्होंने मेरी ओर देखा, मैं उनके ठीक सामने बैठा था और वहीं के वहीं बैठा रह गया, उन्होंने एक नज़र मुझे देखा, जैसे उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ, फ़िर उन्हें पूरा भरोसा हुआ, फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा ही नहीं, उनकी आँखों में कुछ हुआ था, उसी सेकंड के आधे हिस्से में उनकी नज़रों में कुछ बदला था, उन्होंने ऐसे देखा था जैसे अब मेरी वापसी नहीं हो सकती, जैसे मैं कहीं जा चुका हूँ, जैसे मैं गलती से पैदा हुआ कोई जीव हूँ। मैं वहीं था उनके सामने बैठा हुआ, पर वो कोसो दूर खड़े थे। उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी, गीली शर्ट में से बनियान के छेद दिख रहे थे। धुएँ से परेशान होकर उन्होंने नाक रूमाल से ढँक ली और बारिश रुकने का इंतज़ार करते रहे। काश उन्होंने मुझे वहीं पीट दिया होता, मेरे कपड़े फाड़ दिए होते। मेरे बाल खींचे होते, मेरी पीठ पर मुक्के मारे होते, एक झापड़ से मेरे होंठ सुजा दिये होते। वो बस मेरी ओर पीठ कर के खड़े-खड़े गुमठी से बाहर देखते रहे, उनके हाँथ में एक नीली पन्नी थी जिसमें एक मोटी डिक्शनरी झूल रही थी, नीले रंग की और एक मैगज़ीन भी थी “ऑटो ड्राइव”। मेरे हाँथ में लटकी सिगरेट में ऐश जमती रही, मेरे जूतों पे गिरती रही । पापा वहीं खड़े-खड़े मेरे दोस्तों की गाली-गलौज सुन रहे थे। जब उनसे रहा नहीं गया तो तेज़ बारिश में ही निकल गये। भीगते हुए। घर पहुँचा तो माँ, पानी में भीगी “ऑटो ड्राइव” मैगज़ीन टेबल पर फैला कर सूखा रही थी। भैया की डिक्शनरी उसी मैगज़ीन के बाजू में रखी थी। पापा के स्कूल में फेल होने के बाद मैंने उस स्कूल से नाम हटवा कर नये स्कूल में दाख़िला लिया, वहीं जहां सब मेरे ही जैसे थे, जहां हाईस्कूल के लड़के जीन्स पहन कर स्कूल आते थे और टीचर की मजाल नहीं होती थी की उन्हें टोके, पावरफुल फील होता था।
पापा अब मुझे टोकते नहीं थे, उन्होंने मुझे अपने हाल पे छोड़ दिया था। मैं अपने घर में खाना खाता था और सोता था, भैया ऊँचा लंबा हो गया था, स्कूल की क्रिकेट टीम का कैप्टन था, जैसे ही वो बारहवीं में पहुँचा, पापा ने उसे बस पढ़ाई पे फोकस करने के लिये कहा और भैया बिना किसी विरोध के मान गया, वो घंटों अपनी टेबल से नहीं हटता था। पापा उसके लिए एक मैगज़ीन लेकर आते थे जिसमें आईएएस ऑफ़िसर्स के साक्षात्कार होते थे, और मैं एक एडल्ट मैगज़ीन लेकर आता जिसमें विदेशी लड़कियों की नंगी तस्वीरें होती, मुझसे ज़्यादा भैया उसके पन्ने, चाव से पलटता था।
एक समय के बाद पापा को अख़बार पढ़ने की ज़रूरत नहीं रही, भैया उन्हें सब कुछ पढ़ कर सुनाता था।
पापा ने बारहवीं के किसी लड़के को गणित में फेल कर दिया था, उस लड़के ने पापा के मोटर साइकिल की सीट फाड़ दी थी और बचे-कुचे कुशन पर चाकू घोंप दिया, पापा ने उस लड़के के पिता से बात की, वो सज्जन आदमी थे, उन्होंने पापा को आश्वासन दिया था कि वो अपने बेटे को समझायेंगे। लड़के ने अगले दिन घर आकर पापा से शिकायत की थी उन्हें उसके बाप से शिकायत नहीं करनी चाहिए थी। घर के पास आकर पापा को धमकाने वाले इस लड़के का हम लोगों ने मिलकर इतना मारा कि उसका जबड़ा टूट गया था।
मैं घर के ऊपर लटकने वाला काला मटका बनते जा रहा था जो परिवार को सभी बलाओं से दूर रखता है।
अस्पताल के गलियारे में स्ट्रेचर के चकों की कर्कश आवाज़ गूंजी, किसी इमरजेंसी पेशेंट को ले ज़ाया जा रहा था, उसके परिवार वाले पीछे-पीछे तेज़ गति से चल रहे थे । पापा नींद से उठे और उन्होंने पानी माँगा, उन्हें ठंड लग रही थी, मैंने सिस्टर मैरी का दिया हुआ कंबल उढ़ा दिया। अस्पताल में निःशुल्क खिचड़ी मिल रही थी, मैं पापा के लिए खिचड़ी लेकर आया। उन्हें नींद से उठाया “पापा, खिचड़ी”। उन्होंने प्लेट पकड़ने के लिए अपना हाँथ आगे किया “आप ख़ुद से नहीं खा पाएँगे।” पापा लेटे रहे, उनके तकिये को थोड़ा सा ऊपर उठाया और पानी पिलाया, एक बूँद उनके गालों से होकर ठुड्डी से उतरते हुए गर्दन के पीछे चली गई, मैंने उनकी लटकती हुई चमड़ी देखी, उनकी कॉलर बोन उठकर दिखायी दे रही थी। पापा इतने कमज़ोर और बूढ़े कब हो गये? मैंने साफ़ नैपकिन से उनके होठों के नीचे का पानी पोछा। एक-एक चम्मच करके मैंने उन्हें खिचड़ी खिलायी, उन्होंने हाँथ उठा कर “बस हो गया” कहा, मैंने उँगलियों को गीला कर उनका मुँह पोछा फिर एक कपड़े से उनकी ठुड्डी साफ़ की ।कितना अजीब होता है अपने पिता से सालों बात ना करना और फिर उन्हें अपने हाथों से इस तरह खाना खिलाना, इस समय वो निश्चित चाहते थे कि भैया आ जाये।खाना खाकर वो लेट गये। फ़ोन की घंटी बजी पर सिग्नल की एक ही डंडी थी।
“मैं आता हूँ” कहकर मैं स्टूल से उठा, कोशिश थी की कोई आवाज़ ना हो पर फिर भी फ़र्श पर स्टूल के पीछे सरकने की तेज़ आवाज़ हुई पर सभी पेशेंट सोते रहे
“कहाँ जा रहे हो?”
इतने सालों में पापा के मुँह से मेरे लिए, जो पहले शब्द निकले वो यही थे, मुझे सालों बाद किसी ने टोका था, किसी ने रोका था।“यहीं हूँ” मैंने कहा
“ठंड बहुत है, तुमने कुछ पहना है की नहीं?”
“स्वेटर है”
“खाना?”
“खा लूँगा”
“मेरा पर्स तुम्हारे पास है ना?”
मैंने उन्हें पर्स दिखाया
“उसमें पैसे हैं, खा लो”
मैं चुप रहा। इस बार जब उठा तो कह कर उठा कि “आता हूँ” और वहाँ से बाहर निकल आया
कई बार मैं अपने आप को ऑटो के गोल आईने में देखता हूँ और लगता है कि मैं बहुत शांत हो गया हूँ पर भीतर इतना ग़ुस्सा भरा है। इतनी ताक़त, इतनी उदासीनता कि लगता है मैं किसी का सर फोड़ दूँ, हड्डियों के टूटने की आवाज़ सुनूँ, कोई मुझसे माफ़ी माँगे, पता नहीं क्यों ? मेरे भीतर दुख और हिंसा अग़ल बग़ल रहते हैं। मैंने सब कुछ दबा लिया है अपने अंदर, जैसे तकिये से किसी सोये हुए का मुँह दबाते हैं वैसे। कितने कम में कितना कुछ हो जाता है, बीत जाता है, महसूस किया जाता है, पापा और मेरी जितनी भी बात हुई उसमें मेरे अंदर दुनिया भर की उठा-पठक हो गई है।
मैं ऑटो लेकर निकल गया, इस क़स्बे की सड़कों पे भटकता रहा, स्ट्रीट लैंप की धुंधली रोशनी में जितनी सड़क दिखती उसी पे ऑटो दौड़ाता रहा। पूरा क़स्बा सूना पड़ा था पर शराब की एक दुकान के सामने लोग खड़े थे। मैंने ऑटो रोक दिया, लोग कोने में खड़े होकर जल्दी-जल्दी गिलास में शराब पीकर गिलास फेंक रहे थे। रंग बिरंगी बोतलें झिलमिल हो रही थीं, दुकान के एक बग़ल में नाली थी, मसले हुए प्लास्टिक के गिलास उसमें तैर रहे थे। नाली का पानी झूठ नहीं बोलता, हम सबकी गंध, हम सबकी बुराइयाँ, फेंकी हुई चीज़ें सब इसमें बाइज़्ज़त रहती हैं।
भैया का जब तीसरे अटैम्प्ट में यूपीएससी नहीं निकला तब उसने बैंक की तैयारी शुरू की, शिक्षक की भर्ती में कई एग्जाम दिये, कितने रिज़ल्ट्स आये, कितनों से नकारा गया, कितनों में रिश्वत माँगी गई।कई एक्साम्स में सिलेक्शन के बाद भी भर्ती का वेट करते करते महीनों बीत गये।पापा ने भैया की शादी का सोच के घर के ऊपर एक और घर बनवा दिया था, बेडरूम, किचन हॉल, बेडरूम में ही एक वाशरूम था, पापा का मानना था कि भैया की बहू तो पढ़ी लिखी ही आएगी तो मोहल्ले में पहला कमोड हमारे घर लगा था। मैंने उनसे कहा था कि पढ़े लिखे होने का और कमोड का क्या संबंध? बनवाना है तो बुक शेल्फ बनवाओ। भैया बहुत हंसा था, वो उस साल की आख़िरी हंसी याद है उसकी। भैया को पूरा मोहल्ला सोना मानता था, लोगों को बता-बता के थक गया था कि उसके एग्ज़ाम के रिजल्ट आने वाले हैं, पर कोई भी रिज़ल्ट भैया के पक्ष में नहीं था। पापा का रवैया धीरे-धीरे भैया को लेकर उदासीन हो गया था, एक बेटे ने कोशिश ही नहीं की, दूसरे की सैकड़ों कोशिशों से कुछ नहीं मिला। भैया चुप-चुप रहने लगा था, खाना खाता था तो खाते ही रहता था, दाल चावल ख़त्म करने के बाद थाली में उँगलियों को घुमाते रहता, किताब के अक्षरों को देखता रहता, सोता तो उठता ही नहीं, पापा के साथ एक कमरे में बैठना बंद कर दिया था उसने, भैया उनसे नज़रें नहीं मिला पाता था। उस दिन पापा स्कूल के लिए निकल चुके थे, मैं चाय पी रहा था, अमूमन इस समय तक भैया नीचे आ जाता था। भैया के कमरे का दरवाज़ा ठकठकाया, दरवाज़ा अंदर से बंद था, मैंने भैया का नाम पुकारा पर कोई जवाब नहीं । माँ पीछे खड़ी थी, हम दोनों ने एक दूसरे को देखा, मैं सीढ़ियों से नीचे उतर कर तेज़ी से बाहर भागा, आँगन में आम का पेड़ था उसकी एक डाल ऊपर वाली फ्लोर कि बालकनी तक जाती थी। मैं फुर्ती से पेड़ पर चढ़ा और बालकनी तक पहुँचा, खिड़की के काँच से अंदर देखने की कोशिश की तो भैया नहीं दिखा ।फिर फ़र्श पर, बाथरूम की चौखट से निकले उसके पैर दिखायी दिये, मैंने खिड़की के काँच को मुक्के मार-मार कर तोड़ दिया। मेरी हथेलियों में काँच चुभ गये थे।बाथरूम की फ़र्श पर सिर्फ़ खून था, भैया ने दोनों कलाइयाँ काट ली थी।उसकी साँसें चल रही थी, अपनी क़मीज़ उतार कर मैंने उसकी कलाइयाँ कसकर बांधी, उसे गोद में उठाकर सीढ़ियों से नीचे उतारा और सड़क पर पागलों जैसे भागा था मैं , माँ खून देख कर वहीं के वहीं खड़े रह गई थी।माँ का मुँह खुला का खुला, उसके हाँथ उसकी छाती पर। बस यही याद है, बस माँ की वही छवि आज भी मन में चिपकी है।अस्पताल पहुँचते-पहुँचते भैया की साँसें टूट चुकी थी। मेरे पूरे शरीर में झुनझुनी थी, एक मंद रफ़्तार में दौड़ती बिजली।। भैया को सीधे ऑपरेशन थिएटर में ले ज़ाया गया। मैं वहीं बैंच पर निढाल होकर गिर पड़ा, एक नर्स मेरे पास आयी और मुझे उठा कर इमरजेंसी वार्ड में ले जाने लगी, मैं भैया-भैया-भैया ही बुदबुदा रहा था, उसने छिली हुई हथेलियों से काँच के टुकड़े निकाले। मैं बस भैया-भैया बोलते रहा। किसी ने पीछे से कहा “ज़िंदा है तुम्हारा भाई, बेहोश है बस” ये सुन कर मेरा बुदबुदाना बंद हुआ।
जब उठा तो पापा और एक साथ के टीचर थे उनके साथ! ओपीडी से कुछ दवाइयाँ लाने को कहा गया और एक फाइल जमा करके पैसे देने थे। पैसे देने के लिए जेब ही नहीं थी मेरे पास, उन्होंने मुझे ध्यान से देखा, फ़ाइल में नाम पढ़ा और पूछा कि क्या मैं मास्टर आनंद का बेटा हूँ, उन्होंने बताया कि पापा ने उन्हें पढ़ाया है, वो जैसे ही आयें उन्हें ओपीडी भेज दीजियेगा बाक़ी वो देख लेंगे।
पापा जब वहाँ पहुँचे तो उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पूछा, बहुत देर तक बैठे रहे,
“खुश हो गये आप?”
पापा ने मेरी ओर देखा, हाँथ में बंधी पट्टी देखी, ताज़े घाव का खून रिस रहा था
“आदमी को आदमी नहीं रहने दिया, मशीन समझ ली, मर जाता भैया अभी”मैं बड़बड़ा रहा था
पापा के साथ जो टीचर आये थे उन्होंने मुझे चुप कराया, पापा खड़े हुए, उन्होंने एक-एक कर के अपनी क़मीज़ की बटन खोली और मेरे कंधे पे रख दी। मैं पापा से लिपट गया, उन्होंने मेरी पीठ पे हाँथ रखा और मुझे अलग कर दिया।उनकी सफ़ेद चमचमाती बनियान पर मेरे हाँथ के खून के निशान छप गये थे। दो पुलिस वाले आये थे, सुसाइड का केस था। “इसे कुछ खिला लाओ, भूखा है यह” पापा ने अपने साथी से कहा और पुलिस वालों को देख कर कहा “इनसे बात करता हूँ”।डॉक्टर ने भैया को स्टेबल तो किया था पर साथ ही साथ उनके लिए बहुत ज़रूरी था कि वो मेडिकल काउन्सलिंग लें, मैंने पहली बार डिप्रेशन शब्द तब ही सुना था।
भैया बेहोश था पर उसकी स्थिति बेहतर थी! पुलिस वालों ने पापा को साफ़-साफ़ कहा कि वो एक बार पेशेंट से मिलेंगे, उसकी बात सुनेंगे कि कहीं परिवार या किसी की तरफ़ से कोई बर्डन तो नहीं था, फिर जब वो बाहर आएँगे तब पापा को पच्चीस हज़ार रुपये तैयार रखने हैं ताकि पुलिस केस ना बनें। नहीं तो जब भी भैया को नौकरी मिलेगी, और पुलिस वैरिफिकेशन में पता चलेगा कि भैया सुसाइड अटैम्प्ट कर चुका है तो ये भैया के लिये आजीवन अच्छा नहीं होगा।पापा ने मुझे देखा और मेरे सामने अपने साथी को उनका एटीएम कार्ड दिया और पैसे निकाल कर लाने को कहा। मैं अस्पताल से बाहर निकला और चलता ही रहा, तीन दिन तक घर नहीं लौटा, पापा की शर्ट पहने भटकता रहा । मैं दिन भर उधारी पे शराब पीता, जहां मन होता वहाँ सो जाता।कभी पुल के नीचे, कभी सीमेंट के ख़ाली पड़े गोल पाइप में, मुझे याद ही नहीं था कि कितने दिन पहले भैया ने अपने आप को ख़त्म करने की कोशिश की थी, एक दिन, दो दिन, तीन दिन।मुझे याद नहीं कि कितने घंटे, कितने दिन मैं बेसुध रहा। मैं कहाँ शराब पीता और कहाँ गिर पड़ता, जहां भी पड़ा रहता वहीं उठता फ़िर शराब पीता।लोग मुझे दिन में मरा हुआ समझते और रात में मैं जीता-जागता शराबी।चलते-चलते मैं कब कहाँ गिरता इस बात का कोई होश नहीं, उन दोनों में मैं वो सब कुछ बन गया था जो कभी किसी आदमी को नहीं बनना चाहिए। मुझे नाली से बाहर निकाला गया था, मुझपर बाल्टी भर भर कर पानी डाला गया, और खूब सारा पानी जबरन पिलाया गया, मैंने भैया को हर वो गाली दी जिसे सुन के कोई किसी का सर फोड़ दे, जान ले ले, ग़ुस्से में नहीं, शर्म में चीख रहा था मैं। मैंने भैया को मुक्के मारे, लातें चलायी, उसे कुछ नहीं हुआ, मुझमें जान ही नहीं बची थी । मेरे भैया के कपड़ों पर मेरी गंदगी चिपकी थी, जैसे उसका खून मेरी छाती पे था, उसने एक सेकंड के लिए भी नाक नहीं सिकोड़ी, मेरे दोस्तों ने मेरे हाँथ पैर पकड़े, किसी ने एक दो झापड़ रसीदें तब जाकर मैं हल्के होश में आया, मैं दोस्तों की पकड़ में था तब भैया ने मेरे कपड़े उतारे।
वहीं पास के हैंडपंप से मुझे नहलाया, शैम्पू करवाया, वहीं ठेके के बाहर उन्होंने मेरी दाढ़ी बनवायी और बाल कटवाये।मेरे दोस्त खड़े देखते रहे, मैंने धूप में नंगे बैठ कर सिगरेट पी। मेरे दोस्त मेरे आजू-बाजू बैठे थे, वो पल आज भी मुझे एक फोटोग्राफ के जैसे याद है, कितना सुख था उस धूप में, मेरे दोस्तों के चेहरों में, मेरे भैया की आँखों में।
मैं जब मर रहा होऊँगा तब मुझे यही याद आएगा की मैंने एक ठेके के बाहर, हैंडपंप के पास, नंगे बैठ कर सिगरेट पी थी। अपने शुभ चिंतकों से घिरा हुआ था।
बहुत ही सस्ते साबुन की वो गंध, मेरे ऊपर और पानी डाला गया, भैया ने टॉवल से सुखाया, मुझे अपने हाथों से नयी चड्डी पहनायी, बाज़ार लेकर गया, कपड़े दिलवाये, परफ़्यूम डाला, भैया ने पूछा था “क्या खाएगा?”
“जलेबी” बस यही निकला मेरे मुँह से
हम दोनों भाइयों ने सालों बाद जलेबी खायी, फिर वो मुझे घर लेकर आया
पापा आज नौकरी से रिटायर हो रहे थे। उन्होंने कोई ताम-झाम नहीं किया था पर शाम में पूरा स्कूल उन्हें छोड़ने घर तक आया था। घर के दरवाज़े से लेकर सामने के छोटे गार्डन तक स्कूल के बच्चे फ़ूल फेंक रहे थे, बहुत से बच्चे रो रहे थे। घर के बाहर एक नाली थी, मैं चुप चाप खड़ा उस नाली को घूर रहा था। नाली की गंध मेरे नथुनों में समा गई थी, जब भी मैं शराब के बारे में सोचता, मुझे नाली के पानी का स्वाद उसी तेज़ महक के साथ याद आता।
उस दिन से आज तक मैंने कभी शराब नहीं पी।
अचानक मुझे ऑटो के सामने वही आदमी खड़ा दिखा जिसकी जेब से हॉल में सिक्के गिरे थे, जो कुछ समय पहले पिता बना था।उसने पूछा “आपको पता है यहाँ रूम हीटर कहाँ मिलेगा, मेरी पत्नी को ठंड बहुत लग रही है, पूरा मैटरनिटी वार्ड एकदम ठंडा है”। मैं उसे ऑटो में बैठा कर निकल पड़ा, पूरा शहर सुनसपाट था। ठंड बढ़ जाने से लोग दुकान बंद कर के घर चले गये थे, इलेक्ट्रॉनिक गली में एक दुकान मिली, लगभग बंद हो रही थी। “रूम हीटर” मिला पर आदमी के पास पैसे कम थे। मैंने कुछ अपने पैसे मिलाये और रूम हीटर लेकर हम लोग वापस अस्पताल पहुँचे। मैटरनिटी वार्ड में रूम हीटर चालू करते ही बहुत सी औरतें अपने नवजात बच्चों को लेकर रूम हीटर के पास बैठ गई, गाँव की औरतें रूम हीटर को वैसे ही निहार रही थी जैसे आदि मानव सूरज को निहारा करते थे। वो आदमी अपनी औरत के बग़ल जाकर खड़ा हुआ, उसने वहाँ से अपना बच्चा गोद में उठा कर मुझे दिखाया। मैं मुस्कुरा कर जनरल वार्ड की तरफ़ लौट आया, पापा हल्की नींद में थे, सर के ठीक पीछे लगी खिड़की से हवा अंदर आ रही थी, खिड़की का एक पाला अटका हुआ था, मैंने उठ कर खिड़की को पूरी ताक़त से अंदर की ओर खींचा। धब्ब की आवाज़ के साथ खिड़की बंद हुई। पापा की नींद खुली,
“खा आये?”
हम्म
मैंने पापा का पर्स उनकी तकिया के नीचे दबा दिया
“हम क्या करेंगे, अपने ही पास रखो”
मैंने फिर पापा का पर्स अपने पास रख लिया
कल तुम्हारी माँ भी आएगी?” “पता नहीं, देखिए अब” ।
“अब भी लिखते हो ?”
“नहीं, बस हिसाब लिखता हूँ डायरी में”
“कोई तो आदत लगी तुम्हें मेरी”
“ आप को और भूख तो नहीं लगी है?” उन्होंने हाँथ हिला कर मना किया
उठ कर बैठे और कंबल हटाते ही उन्हें ठंड महसूस हुई
“बाथरूम कहाँ है”
“चलिए”
उनके पैर ठंडी फ़र्श पर पड़ते उससे पहले मैंने अपनी चप्पल वहाँ रख दी, ज़रा देर के लिए रुके, वो समझ गये की उन्होंने मेरी चप्पल पहन रखी है, उनका हाँथ पकड़ कर धीरे-धीरे मैं उन्हें बाथरूम तक ले गया। मैं उनके पीछे ही खड़ा रहा, नल से आया पानी जैसी ही उनकी हथेलियों पे पड़ा, सिहरन से उनके दांत कंप-कंपा गये
उन्हें मैं वापस बिस्तर तक ले आया।
कुछ दवाइयाँ थीं जो उन्हें दर्द कम करने के लिए खानी थी, मैंने उन्हें वो गोलियाँ खिलायी, फिर वो लेट गये । लेटे तो ठंड से काँपते हुए बहुत देर तक मेरा हाँथ कस के पकड़े रहे। मैंने हथेलियाँ घिस कर गर्म की, फ़िर उन्हें उनकी हथेलियों पर रख दिया। उनके तलुए रगड़े।
मैं बाहर निकल कर मैटरनिटी वार्ड तक गया, वो आदमी बाहर ही बैठा था, मैंने उसे बताया कि पापा को बहुत तेज़ ठंड लग रही है, क्या कुछ देर रूम हीटर पापा के वार्ड में रख सकते हैं? वो तुरंत रूम हीटर लेकर बाहर आया। वो पापा के वार्ड तक साथ आया फिर दरवाज़े से उसने पापा को देखा, जैसे मैंने उसके बेटे को देखा था वैसे ही।
पापा को रूम हीटर की आँच जैसे ही महसूस हुई, एक राहत की साँस उन्होंने छोड़ी
“थोड़ी देर में मैं वापस ले आऊँगा!” मैंने उस आदमी से कहा
“जब तक वो कमरा वापस ठंडा होगा, ये गर्म हो जाएगा” उसने कहा अगर वो इसका उल्टा कहता की “जब तक ये कमरा गर्म होगा, तब तक वो कमरा ठंडा हो जाएगा” तो मैं तुरंत ही उसे रूम हीटर लौटा देता
“अब ठंडी तो नहीं लग रही” मैंने पापा से पूछना चाहा पर उन्हें चुप चाप देखते खड़ा रहा, उनकी साँसें बेहतर हो गई थी, कंपकंपी भी जा चुकी थी ।मैं बाहर आकर बैठ गया, एक लंबी पत्थर की बेंच, जिसका एक सिरा पापा के वार्ड से शुरू होता था और दूसरा मैटरनिटी वार्ड तक जाता था। उस आदमी ने पूछा
“आपके पिता जी को देख कर लगता है कि आर्मी से रिटायर हुए हैं”
“जाना तो उन्हें वहीं था, पर जा नहीं पाये, पर हाव भाव, चाल चलन, सब वैसा ही है, बाल भी वैसे ही कटवाते हैं”
वो आदमी बार बार आस्तीन के अंदर अपनी हथेलियों को छुपा रहा था
“ठंड लग रही है आपको?” मैंने पूछा
उसने हंसते हुए नहीं में सर हिलाया और बोला “बाप बन गया हूँ, मज़बूती आ गई है”
सिस्टर मैरी हॉल की तरफ़ बढ़ी, उन्होंने साड़ी पहन रखी थी, उनके घर लौटने का समय था। वार्ड के दरवाज़े से ही उन्होंने पापा की तरफ़ देखते हुए कहा “ओह! ही इस स्लीपिंग, लेट हिम रेस्ट!”
“उन्हें अचानक बहुत ठंड लग रही थी सिस्टर”
“ठंड है ही इतना ज़्यादा और पेशेंट को तो ज़्यादा ही लगता है, तुमको ब्लैंकेट दिया था वो किधर है?”
मैंने पापा की तरफ़ इशारा किया।
सिस्टर मैरी मेरी तरफ़ बढ़ी और मेरे कानों पर हथेली रख कर खड़े रही, उनकी हथेलियाँ गर्म थीं-
“तुम भी बीमार पड़ जाएगा, आइस जैसे ठंडा है कान” उन्होंने डाँटा
उनकी बात सुन कर आदमी ने भी अपने कानों पे हाँथ रखा, उसे भी अपने कान ठंडे लगे
सिस्टर मैरी तुरंत एक रूम से दो ब्लैंकेट लेकर आयी।
मैंने कहा “मैंने इनसे पूछा की ठंड लग रही है तो बोलता है कि अब मैं बाप बन गया हूँ तो मज़बूत हो गया हूँ”
सिस्टर मैरी ने घूरते हुए उसे देखा और कहा “अगर तुम्हें सर्दी हुआ और तुम्हारा इन्फेक्शन बेबी को गया तो पूरा मज़बूती निकाल दूँगी” । आदमी ने जल्दी से कंबल उनके हाथों से लेकर अपने आप को पूरा ढँक लिया और मेरी तरफ़ ऐसी नज़रों से देखा जैसे मैंने उसे धोखा दिया हो। सिस्टर मैरी ने जाते-जाते बताया कि अरुण भैया ने उन्हें फ़ोन किया था, उन्होंने अरुण को बोल दिया की “योर ब्रदर इस टेकिंग गुड केयर ऑफ़ हिज फादर, डाँट वरी!”
“थैंक यू सिस्टर”
“तुम थैंक यू बोलेगा सिस्टर मैरी को” उन्होंने मेरे सर पे हाँथ रखा और चली गई, जाते जाते फिर मुड़ी “पूछना ही भूल गया! मम्मी कैसा है?”
“मम्मी भैया के साथ है, एकदम ठीक”
“आयेंगी तो घर लाना उन्हें, काफ़ी टाइम हो गया है, बोलना सिस्टर मैरी याद कर रही थी” कहकर वो चली गई
“आप की जान पहचान की हैं”
“सालों से! भैया जब इस अस्पताल में पैदा हुआ तब भी थी सिस्टर मैरी और मैं हुआ तब भी, मैं हुआ तो मेरी साँसें नहीं चल रही थी, डॉक्टर सीपीआर दे चुके थे पर फिर भी कुछ नहीं हुआ, सिस्टर मैरी मुझे गोद में उठा कर हिलाते रही, उन्होंने वो सब कुछ किया जो किसी को बचाने के लिए किया जा सकता है, फिर मैं रोया था शायद और सिस्टर ने मुझे मम्मी के बग़ल में लेटा दिया।” मम्मी जब ठीक हुई तो उन्होंने सिस्टर को घर बुलाया था खाने पर, सिस्टर मैरी केरल के एक गाँव से यहाँ आई थी, उन्हें पहली बार किसी ने अपने घर बुलाया था खाना खाने, फिर हर साल वो आते रही। घर में जब भी कोई मेडिकल इमरजेंसी होती है वो हमेशा आसपास होती हैं”
भैया को भी जब काउंसलिंग के लिये यहाँ लाया गया था तो सिस्टर मैरी ने उनका बहुत ध्यान रखा। सिस्टर मैरी ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें अख़बारों और मैगज़ीन से वो कहानियाँ सुनाया करती जो उम्मीद देती थी, बाइबिल के वर्सेज़ सुनाती, उन्हें यहाँ गार्डन में टहलाती।
आदमी ने कहा “सिस्टर मैरी देवी हैं ”
अचानक स्टाफ की एक नर्स ने बाहर झांका और लंबा “श्श” किया, उनकी उँगली उनके होठों पर थी।
एक अजीब बात लगती है डॉक्टर और नर्स सबसे ऐसे बात करते हैं जैसे सब उनके लिए स्कूल के ज़िद्दी बच्चे हैं ।
हम दोनों चुप हो गये, उस आदमी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपना सर दीवार पर धीरे से टिका लिया, मैं वहाँ से उठ कर टहलता हुआ हॉल कि तरफ़ आया। हॉल में बल्ब जल रहे थे पर अंधेरा था, सबसे ज़्यादा रोशनी इशू के सफ़ेद लबादे से ही मिल रही थी, मैं फिर उसी पेंटिंग को देखता रहा जिसमें एक लड़का एक बूढ़े आदमी से लिपटा हुआ है, बूढ़े आदमी के लाल लबादे की चमक साफ़ दिख रही थी। मैरी की आँखों का नीला रंग आसमान जैसा शांत था।
मैं हॉल में बैठे बैठे अपनी छोटी सी डायरी पलटाने लगा - मैंने पापा से झूठ बोला था कि अब बस मैं हिसाब लिखता हूँ, मैं लगातार कुछ कुछ सोचते रहता था, जो बीत गया है वो सब, इतना कुछ देखा था इन अड़तीस सालों में। ऑटो स्टैंड पे खड़े-खड़े मैं कितने ही डायरियों में कितना कुछ उतार चुका था। मैं पैदा होकर यहीं, इसी अस्पताल के हॉल से बाहर निकला था आज इतने सालों में कितना कुछ बदल गया है, पर ये बेंच वैसी ही है। इस अस्पताल के ट्यूबलाइट, पंखे लकड़ी के दरवाज़े, चैनल गेट सब कुछ पुराना है, जैसे मैंने बचपन से देखा वैसा ही। जब सब कुछ बदल चुका हो तो ऐसी जगह लौटने का बहुत मन करता है जहां कुछ नहीं बदला या कुछ नहीं बदलने का आभास हो। सामने टंगे क्रॉस के निशान के इर्द गिर्द लगी लाल लाइट निरंतर जलते रहती है। सर्दी का अंधेरा और अजीब लगता है। बाहर दो तीन गार्ड आग जला के बैठे थे, लगातार अपनी हथेलियाँ घिसते और हाथों को आग पे तैराते। कोई आपस में बात नहीं कर रहा था, जैसे एक सेकंड के लिए भूल गये हों कि वो सब बोल भी सकते हैं। एक अजीब सी उदासी पसरी हुई थी, मैं सुबह के इंतज़ार में था, कितने लोग हर रात यहाँ, इस अस्पताल में सुबह के इंतज़ार में ही होते हैं। जब यहाँ सब कुछ शांत हो जाता है तो लाइफ सपोर्ट मशीनों की आवाज़ साफ़ सुनायी देती है, सन्नाटे में टूँ-टूँ की आवाज़े, लगातार आती हैं, उन्हें सुनते सुनते एक मशीनी लोरी का आभास होता है।बहुत से मरीज़ों का शरीर जीवित रहने के लिए लड़ रहा है, उसी लड़ाई की आवाज़ें इन मशीनों से निकलती है।
कंबल लपेटा आदमी हॉल के गेट पे खड़ा दिखाई दिया, “ओ भैया! आपके बाऊजी बुला रहे हैं!
मैं अंदर गया तो पापा बिस्तर पे बैठे हुए थे, उन्हें घबराहट हो रही थी।
“क्या हुआ”
“अजीब सा लग रहा है, छाती में कुछ फँसा-फँसा सा”
मैंने पीठ पे हाँथ फेरा, और फेरता रहा, अचानक उनकी डकारें शुरू हुई, पाँच दस मिनट बाद उन्हें आराम लगा
“चाय पी ली थी क्या”
“बहुत थोड़ी सी”
“कम थोड़ी सी या बहुत थोड़ी सी”
उन्हें एक लंबी साँस ली और धीरे से लेटने को हुए , मैंने उन्हें लेटाया
“अरुण कितने बजे आएगा?’
“अभी तो रात है, आएगा तो आपके सामने ही आएगा ना” मैंने थोड़ा खीज के कहा, “और मैं हूँ तो”।
“मुझे तो ये भी नहीं पता था कि तुम थे कहाँ! वह तो अरुण ने एंड टाइम पे भेजा तुम्हें। एक ही शहर में बाप बेटे अलग अलग रहते हैं”
“मैं अलग इसलिए रहता हूँ क्योंकि आपने घर से निकल जाने के लिए कहा था।”
“कभी नहीं”
“दरवाज़े से बाहर धकेला था, माँ देखते रही थी”
पापा चुप हो गये
“अगर आपको पता होता कि अरुण भैया बाहर के शहर जाके बसेगा तो आप मुझे नहीं निकालते ना”
पापा बहुत देर तक चुप रहे
“तुम्हें अपने सामने और बर्बाद होते हुए नहीं देख सकता था”
“ये सब बातें पापा, अब कोई मतलब नहीं है, सो जाइए, और भी लोग हैं जाग जाएँगे”
मुझे नहीं याद मैं कितनी देर तक वहीं बैठा रहा चुप चाप, उसी ठंडे स्टूल पर।
पापा सो गये थे। मैं उठ कर बाहर आया तो आदमी भी सो रहा था। धीरे से मैं अपने आप को कंबल में लपेट कर बैठ गया। माँ कह रही थी “बेटा, कोई दुकान डाल देते हैं, तू कुछ तो शुरू करेगा!” पापा ने उन्हें बीच में टोका “ किसी से कुछ भी उम्मीद मत लगाया करो तुम, ये लड़का शांति से जिये और हमें जीने दे, बस बहुत है!” मैं कुछ भी कहने की शक्ति खो चुका था, पूरा जीवन पिता को साबित करने में निकाल दिया था कि मैं कुछ हूँ, और हर बार मैं उन सब चीज़ों में असफल हुआ। पापा के हिसाब से ना तो मैं अव्वल दर्जे का शराबी बन पाया और ना ही शातिर चोर! मुझे दिखा उनकी आँखों में वो जो एक बेटे को कभी पिता कि आँखों में नहीं दिखना चाहिए, बोझ!
मैंने घर से बाहर निकल गया, सभी दोस्तों के बारे में सोचा की किसी के पास कहीं कोई काम होगा, किसी की पहचान में कोई होगा जो काम दे सकता हो, फिर एक बात और समझ आयी की मेरे सारे दोस्त लगभग मेरे जैसे ही थे - अपने अपने बापों की आँखों के बोझ। पूरा दिन सारा शहर भटकने के बाद मैं चौराहे पे बैठा हुआ था, बग़ल में ऑटो स्टैंड था। एक आदमी एक एक ऑटो वाले के पास जाकर उनसे कुछ पूछ रहा था। पाँच छह ऑटो वालों के पास से जब वो वापस लौट रहा था तो मैंने उस से पूछा की क्या बात है, वो आदमी बोला उसने शहर में ऑटो किराए पे दे रखे हैं - एक ऑटो चलाने वाला तीन महीने के लिए अपने गाँव गया है, तो उसे ऑटो चलाने वाला चाहिए।
मैंने कभी ऑटो नहीं चलाया था पर मैंने उससे कहा कि मैं चलाऊँगा। रोज़ का दो सौ रुपया उसे देना होगा। मैंने कहा मंज़ूर, उसने मेरे बारे में पूछा, पापा का नाम सुनते ही वो सकपका गया, तुम आनंद मास्टर के बेटे हो, ऑटो चलाओगे!
मैंने कहा - मैं आज से किसी का बेटा और भाई नहीं बस ऑटो चलाने वाला हूँ । कुछ दिनों तक मैं घर नहीं गया। भैया के फ़ोन आये, मैंने उसे कह दिया -कुछ दिन बाद मिलूँगा
ऑटो में ही मेरा घर था, ऑटो ही मेरा बेडरूम, ऑटो ही मेरा भोजनालय। मैंने एक गणपति की तस्वीर लगायी ,उस दिन से ऑटो मेरा मंदिर भी हो गया।
दो हफ़्तों बाद जब ऑटो लेकर मैं घर पहुँचा था तो माँ मुझे एक-टक देखते रही, पापा गार्डन में थे और जासवन तोड़ रहे थे। दोनों असहज थे, माँ मुस्कुरायी थी। माँ को बहुत दिनों से एक कमर का पट्टा लेना था, मैं उनके लिए वही लेकर घर गया था
पापा मुझे और ऑटो को बारी-बारी देखते रहे, चैनल गेट खोलने के लिए मैंने जैसे ही लीवर को उठाया, पापा ने मेरा हाँथ रोक दिया और कहा की किसी को बताना मत की तुम मेरे बेटे हो। मेरे निकम्मे बैठे रहने से तकलीफ़ थी अब उन्हें मेरे ऑटो चलाने से भी तकलीफ़ थी, मैंने अंदर आने की एक और कोशिश की, पापा ने इस बार मुझे छाती पे धकेल के पीछे किया ।
जैसे एक आदमी अपने बेटे को नहीं, एक आदमी दूसरे आदमी को पीछे धकाता है,
“चला जाऊँगा पापा, माँ को ये पट्टा तो दें दूँ” पापा ने वो बेल्ट मेरे हाँथ से छीन कर फेंक दिया।
“गुंडा गर्दी करेगा, शराब पीकर नाली में पड़े रहेगा, ऑटो चलायेगा!” और क्या क्या करेगा तू!
माँ आगे आयी “आप तो बहुत ही कर रहे हैं, रिटायरमेंट के बाद से कुछ भी अनाप-शनाप बकते हैं, आजा बेटा, तू अंदर आजा”
माँ ने पापा का हाँथ गेट के लीवर से हटाने के लिए अपना हाँथ उनके हाँथ पे रखा, पापा ने उनका हाँथ झटक दिया, माँ को गेट का लोहा हाँथ में लग गया। मैंने एक कदम आगे बढ़ाया पर पापा ने इस बार और ताक़त से मुझे पीछे धकेला, अगले ही सेकंड में जब माँ के हाँथ से खून की धार फ़र्श पे गिरी, मैं आगे बढ़ा, पापा माँ को छोड़ मुझे रोकने की कोशिश में थे
मैंने इस बार पापा के हाथों को हटाते हुए उन्हें पीछे धकेला, भैया आज घर में ही था उसने बस देखा कि मैंने पापा को धकेल कर गिराया है। उसने पापा को उठाया, पापा की कोहनी में चोट थी। माँ ने पल्लू से हाँथ ढँक लिया था, जो लाल हो गया था। भैया ये देख बस मुझे देखता रहा - “ये क्या किया तूने! ये क्या किया तूने!” बोलते हुआ वो मेरे पास आया
और पूरी ताक़त से मुझे एक तमाचा मारा, उतना दुख, उतना दर्द मुझे कभी नहीं हुआ था, भैया मुझे मारते रहा, उसे रोकने के लिए मैंने उस पीछे धकेला, वो मेरी तरफ़ आगे बढ़ा इस बार मैं भी उस पर कूद पड़ा, भैया थोड़ी देर तो संभला फिर निढाल हो गया, मैं उसपे मुक्के बरसा रहा था, माँ ने मुझे पी पूरी ताक़त से पीछे खिचा “तू चला जा, तू चला जा यहाँ से!”
मैं उठा और चला गया।
मैंने कभी किसी से बात नहीं की, पर खबर सब की थी । भैया ने इस समय सरकारी एग्जाम और उन किताबों का पोथा पीछे फ़ेक शहर के बाहर एक प्राइवेट इंगलिश स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था। पहली तनख़्वाह में आँठ हज़ार रुपये मिले थे, फिर उसी स्कूल की बड़ी ब्रांच में भेजा गया, एक दूसरा शहर, वहाँ उसने हाईस्कूल के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया था, वो घर से वहाँ आना जाना करता था। जिस दिन भैया से हाथापाई हुई, मैं ऑटो चलाता हुआ बस निकल पड़ा था, शहर पीछे छूट गया था। मैं यहीं आया, इसी अस्पताल और सिस्टर मैरी की शिफ्ट ख़त्म होने का वेट किया, वो मुझे घर ले गई, गरम-गरम सूप पिलाया। मैंने उन्हें बताया कि मैं ऑटो चलता हूँ तो उन्होंने मेरे सर पे हाँथ फेरा और कहा - जो काम करो मन लगा के करो, झाड़ू भी लगाओ तो ऐसे लगाओ की तुमसे अच्छी झाड़ू कोई नहीं लगा सकता,
मैंने उन्हें कहा कि मैं और भी कुछ करना चाहता हूँ, पर क्या करूँ समझ नहीं आता, इसी जीवन में बेहतर महसूस करना चाहता हूँ।सिस्टर मैरी ने कहा की अपने ऑटो को एम्बुलेंस बनवा लो, ग़रीबों को या इमरजेंसी एक्सीडेंट केस को अस्पताल तक पहुँचाओ। मैंने ऑटो पे बड़े लाल अक्षरों में एम्बुलैंस पेंट करवा लिया उसके नीचे मेरा नंबर - कार्ड छपवाये और लोगों में बाँट दिये। मैंने सिस्टर मैरी से किसी भी घाव का खून रोकना सीखा, घबराये पेशेंट को शांत कराना सीखा, ऑटो में फर्स्ट ऐड का सामान रखने लगा
कई गर्भवती औरतों को, कई एक्सीडेंट में घायल हुए लोगों को मैं अस्पताल पहुँचा चुका हूँ। लोग मेरा नंबर ऑटो गणेश के नाम से ही सेव करने लगे, कई सोशल इवेंट्स में मुझे बुलाया गया, मेरे साथ साथ शहर के कुछ दर्जन भर ऑटो वाले भी यही सेवा देने लगे, ऐसा नहीं है कि मैं इमरजेंसी में जिन लोगों को अस्पताल पहुँचाता वो मुझे पैसे नहीं देते थे, वो तो जितना बनता था उस से ज़्यादा देने की कोशिश करते थे, कई बार नहीं भी दे पाते थे।मैं किसी के लिए कभी भी अवेलेबल, मैं दिन रात बस ऑटो ही चला रहा था। रोज़ कुछ चार पाँच रुपये की कमायी हो जाती थी, एक कमरा भी ले लिया था, शहर के दूसरे हिस्से में। पापा कहते तो सही थे अपने कमाए बिस्तर पर नींद बहुत अच्छी आती है।
मुझे याद है बारिश का मौसम था, मैं ऑटो लेकर स्टैंड पे खड़ा हुआ था।अचानक बारिश से बचते हुए माँ और भैया आकर ऑटो में बैठ गये, मैंने रेनकोट पहन रखा था । उन्होंने कहा- मंदिर चलना है।
मैं चुप चाप ऑटो चलाते रहा, रियर व्यू मिरर में माँ को देखते रहा। मंदिर के सामने जब वो दोनों उतरे तो पूछा “कितने पैसे हुए” - मैंने भैया को देखा उसकी आँखों में आँखें डालकर और ऑटो आगे बढ़ा ली । रियर व्यू में दिखा था - भैया भी खड़े होकर मुझे देखते रह गया था। मैंने छोटे छोटे बाल कटवा लिए थे, कसरत करने लगा था, सुबह आँठ बजे मैं रिक्शा स्टैंड पे होता था, बाक़ी रिक्शा वालों के जैसे शराब का खर्च नहीं था मेरा, तो रोज़ बचत अच्छी हो जाती थी।
एक दिन दरवाज़े पे दस्तक हुई, मैंने दरवाज़ा खोला तो भैया खड़ा था, अंदर आकर उसने मेरे छोटे से साफ़ कमरे को देखा। और कुर्सी पे बैठ गया, मैंने तुरंत एक गिलास पानी उसे ट्रे में रख कर दिया, ट्रे देख कर वो हंस पड़ा। जीवन में पहली बार तूने मुझे ऐसे पानी पिलाया है, फिर कुछ रुक कर कहा की तूने मुझे शायद पहली बार पानी पिलाया है। भैया बहुत देर तक ऑटोड्राइव मैगज़ीन के गट्ठे को देखते रहा, मैं घर से बस वही लेकर आया था।भैया को उसी प्राइवेट स्कूल की मेन ब्रांच भेजा गया जो शहर में थी, वहाँ भैया फिफ्थ से लेकर हाईस्कूल तक के बच्चों को कोई भी सब्जेक्ट पढ़ा लेता था। सोशल साइंस, मैथ्स और साइंस, क्रिकेट की भी कोचिंग देता था। भैया का आत्मविश्वास लौट आया था, बच्चे उस से पढ़ना चाहते थे। धीरे धीरे कर के भैया ने वहाँ ट्यूशन भी चालू की। और बच्चे बड़ी तादाद में आने लगे। जल्द ही भैया ने वहाँ एक बढ़िया घर किराए पे लिया, मम्मी और पापा दोनों उसके घर गये, वहाँ रहे, फिर माँ कुछ दिन के लिये वही रुक गई, भैया के पास,
क्या मम्मी कभी ऐसे मेरे पास रुकेगी?
भैया ने बताया कि वो दूसरे शहर में ही रहने लगा है, शनिवार-रविवार आता है कभी कभी, मम्मी का भी वहीं मन लग गया है। मैं उसे बस स्टैंड तक ऑटो में बिठा कर ले गया, भैया उतरते उतरते बोला-“पापा को देखना थोड़ा”।साप्ताहिक बाज़ार लेकर आये गाँव वालों को मैं ऑटो में बैठाता था, उनकी बोरी से निकलती धनिया, प्याज़ और आलू की सुगन्ध, ऑटो में रह जाती थी। अच्छा लगता था। कुछ ही दिनों बाद बाज़ार में था और एक जगह लोग झुंड बना कर खड़े हुए थे, पता चला कि कोई बुजुर्ग बेहोश हो गये हैं ।आगे बढ़ा तो तो टमाटर थैली से निकल कर बिखरे हुए थे, बाक़ी सब्ज़ियाँ भी फैली हुई थी।लोगों ने भीड़ लगा रखी थी, मुझे देख कर सब हटे, पापा बेहोश थे, उन्हें एक बेंच पर लेटा रखा था। मैंने भीड़ को दूर हटाया, उनके शर्ट की बटन खोली, ऑटो में बैठाया और अस्पताल ले गया, सर पे हल्की खरोंच थी, डॉक्टर ने बताया की ब्लड-प्रेशर अचानक कम हो गया था। शहर के अस्पताल में ओपीडी से लेकर टेस्ट रिजल्ट तक,हर काम की लंबी लाइन थी।पापा बहुत तकलीफ़ में थे, उनके पूरे शरीर में मरोड़ उठ रही थी। मैंने उन्हें उठाया , वो कराहते रहे, उन्हें मैं ऑटो में बैठा कर इस अस्पताल ले आया।
बावीस किलोमीटर ऑटो चलाते-चलाते उँगलियाँ सुन्न पड़ गई थीं ।यहाँ पहुँचते ही सिस्टर मेरी ने उनके सिंपटम्स डॉक्टर को बताये, भैया को यहाँ पहुँचते ही फ़ोन कर दिया था। डॉक्टर्स ने कुछ टेस्ट लिखे, जब तक पापा को पेनकिलर देकर सुला दिया गया। टेस्ट में साफ़ था की पापा के शरीर में पोटैशियम लैवल कम हो गया था जिसके कारण मांसपेशियों में खिंचाव हो रहा है। पापा को ड्रिप लगायी गई। घबराने की कोई बात नहीं थी।चिड़ियाओं का कलरव कानों में था, मुझे हल्की नींद का आभास था, ना पूरा जागा हुआ था, ना पूरा सोया हुआ। मैं हॉल तक पहुँचा तो देखा की सिस्टर मैरी पापा के बग़ल में बैठी है,
“अब तो तुमको इतना सख़्त नहीं होना चाहिए, तुम्हारा बेटा है , कर रहा है जितना हो सके”
“आपको नहीं समझता सिस्टर, ज़िंदगी भर ऑटो चलायेगा वो”
“इस के पहले तो ऑटो भी नहीं चलाता था ना” पापा चुप रहे
मैं बाहर निकला तो पास के चर्च के फादर और उनके साथ कुछ लोग हाल में खड़े हुए थे, एक-एक कर के लोगों में कंबल और दलिया के पैकेट बाँटें जा रहे थे। फादर बैठे हुए लोगों से बात कर रहे थे, उन्होंने पीछे मुड़ कर ईशू की पेंटिंग को देखा और लोगों से पूछा “इन्हें जानते हैं आप लोग?”
किसी बच्चे ने जवाब में कहा “जीसस क्राइस्ट”, फिर फादर ने मैरी की पेंटिंग कि तरफ़ देखा और पूछा “इन्हें?”
जब किसी की आवाज़ नहीं तो फ़ादर ने ख़ुद कहा “मदर मैरी- ये प्रभु ईशू की माँ हैं”
“और ये कौन सी कहानी है?" फादर की उँगलियाँ उसी पेंटिंग की तरफ़ थी जिसमें एक लड़का, बूढ़े आदमी से लिपट कर गिड़गिड़ा रहा है।
फादर ने पेंटिंग की ओर उँगली दिखा कर कहा ये जो बूढ़ा आदमी है इसके दो बेटे थे, एक कोने में खड़ा हुआ है और दूसरा बाप के घुटनों से लिपटा हुआ और बाप उसे उठाने की कोशिश कर रहा है। जो बेटा कोने में खड़ा है वो बाप का फ़ेवरेट था, कुछ भी हो जाये उसे पता था कि ये हमेशा उसके पास रहेगा और दूसरा, दूसरा बेटा एकदम उल्टा, वो अपने पिता से अपने हिस्से के पैसे लेता है और निकल जाता है, शराब पीता है, जुआँ खेलता है, हर ग़लत काम करता है।
हॉल में बैठे सभी लोग फादर की बातों को ध्यान से सुन रहे थे।
“फिर एक दिन उसका पैसा ख़त्म हो जाता है, वो दर दर भूखा भटकता है, कपड़े फट जाते हैं, वो सारी दौलत लुटा चुका है, उसके पास कोई चारा नहीं होता, वो घर लौटता है। और बाप से लिपट पड़ता है, इस पूरे समय दूसरा बेटा सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करता है, पर वो देखता है कि बाप ने दूसरे बेटे को अपना लिया है। बाप इस बेटे को दावत देता है। दूसरा बेटा बोलता है इतने समय तक मैं आपकी सेवा करता रहा, मैंने आपका ध्यान रखा, और जैसे ही मेरा भाई लौट कर आया, जिसने आपकी दी हुई सारी संपत्ति लुटा दी , इसने सारा समय ग़लत कामों में लगा दिया और आप उसे दावत दे रहे हैं? जवाब में बाप कहता है “ जो मर गया था, वो जीवित हो गया है, जो खो गया था वो मिल गया है, जो चला गया था वो लौट आया है, दिस इस द रिटर्न ऑफ़ प्रोडिगल सन”
हॉल में सब लोग फ़ादर की तरफ़ देख रहे थे
“समझें, ये कहानी से क्या सीख मिलती है।” फादर ने उत्सुक आँखों से पूछा लोग फादर का मुँह ताकते रहे।
“क्षमा, फॉरगिवनेस, अपनों से प्यार, उन्हें उनकी ग़लतियों के बाद भी मौक़ा देना” फादर ने समझाया । फादर से पूछना चाहता था की छोटे बेटे के पास तो बहुत सारे एक्सपीरियंस हैं, उसका क्या? शायद उसका पिता सिर्फ़ उसे इसलिए नहीं अपना रहा क्योंकि वो उसका बेटा है पर देश दुनिया देख कर घर लौटा है, तरह तरह के अनुभव लेकर घर लौटा है, उसने अपने भाई से ज़्यादा जीवन देखा है भले ही बाप उसे आज माफ़ कर दे पर वो फिर कोई गलती करेगा, उसका स्वभाव बदल ही नहीं सकता।
मैं दरवाज़े से ही बाहर लौट आया, और अपनी नोटबुक के पन्ने पलटाने लगा, पेंसिल निकाली और कुछ उकेरने लगा। कोहरा कुछ कम हुआ था, मुझे भैया दिखे, वो माँ को हाँथ पकड़ कर सीढ़ी चढ़वा रहे थे।मैं एक कदम आगे बढ़ा फिर वहीं रुक गया, चुप चाप बैठ गया। भैया और माँ मेरे सामने से पापा के वार्ड की तरफ़ बढ़े। मैं देखना चाहता था कि पापा भैया को देख कर क्या महसूस करते हैं। भैया मुझे फ़ोन कर रहे थे पर अंदर नेटवर्क नदारद था। मैं धीरे-धीरे वार्ड की तरफ़ बढ़ा तो देखा माँ सिस्टर मैरी का हाँथ पकड़ कर खड़ी थी, दोनों एक दूसरे को बहुत प्रेम से देख रहे थे। भैया स्टूल पे पापा के सिराहने बैठा था। सिस्टर मैरी ने मुझे देखा तो मैं दरवाज़े की आड़ में खड़ा हो गया । जब वो बाहर आयी तो उन्होंने सर पे हाँथ रखा और कहा - “जाओ अंदर, बैठो”।
मैंने कुछ नहीं कहा।कहना चाहता था “ द प्रॉडीगल सन नेवर रिटर्न्स सिस्टर”
मैं ऑटो में बैठा रहा। कुछ देर बाद भैया बाहर आए, उनके हाँथ में एक झोला था। माँ और पापा धीरे-धीरे नीचे उतरे। पापा ने उतर कर चारों और देखा। मैं भैया के हाँथ में झोला देखकर उनकी तरफ़ आगे बढ़ा, पापा डिस्चार्ज हो चुके थे। मैंने भैया के हाँथ से झोला पकड़ा, तब माँ ने मुझे देखा और मुझसे लिपट गई।
“कैसा है बेटा?”
“ठीक हूँ”
“सुंदर लग रहा है तू ”
पापा ने बीच में कहा “पर्स तुम्हारे पास ही है ना हमारा”
माँ लिपटी हुई थी, पापा की और पलटी और उन्हें घूरा।
माँ बेटे के गले लगने के बीच किसी को भी पैसों की बात नहीं करनी चाहिए। पापा और भैया थोड़ा आगे बढ़े। मैंने माँ के हाथों में पापा का पर्स थमाया।
माँ ने खूब प्रेम किया, माथे पे चूमा और देख के कहा तेज झलक रहा है तेरे चेहरे से। मैं मुस्कुराया
“घर चल बेटा”
“आऊँगा ना माँ” माँ मुझे देखते रही, “पक्का आऊँगा”
“कार कहाँ है भैया” मैंने पूछा
भैया ने रिमोट से कार अनलॉक की, थोड़ी दूरी में एक सफ़ेद ऑल्टो में बीप-बीप की आवाज़ हुई दिया। पापा कार के पास जाकर पहले से खड़े हो गये ।मैंने सामान कार में रखवाया, पापा सामने की सीट पे बैठे थे। और एकदम सीधा देख रहे थे।
“भैया, माँ घर आना” कहकर मैं ऑटो की तरफ़ बढ़ा। मैं कार को रियर व्यू मिरर में देख रहा था।।
मेरा रोम-रोम कह रहा था कि काश मम्मी और पापा अभी उस कार से निकलें और मेरी ऑटो में पीछे बैठ जायें। उनके बैठने से पहले मैं सीट साफ़ कर दूँ। उनके बैठने के बाद जब मैं किक मारूँ, और ऑटो चालू हो तो भैया भी मेरी बग़ल में आकर बैठ जाये और मैं इन तीनों को ऑटो से पूरी दुनिया घुमाने निकल जाऊँ ।
रियर व्यू मिरर में कार हॉस्पिटल गेट से जाते हुए दिखाई दी ।सिस्टर मैरी दूर से उन्हें जाते हुए देख रही थी, मैं रुका हुआ उन्हें, जाते हुए मेरे परिवार को, देखते हुए देख रहा था। मैंने पेंसिल निकाली और डायरी में यही दृश्य उकेरने लगा। फ़िर डायरी वहीं एक होल्डर में रख दी, ऑटो चालू करने के लिए किक उठाने नीचे झुका ही था कि वो आदमी जो कल पिता बना था, मेरे सामने खड़ा था। “बस स्टैंड चल सकते हैं? माँ बाऊजी बस से पहुँचे हैं उन्हें लेकर आना है।” उसने रिक्वेस्ट की। बस स्टैंड पे छोटे क़द के दो बूढ़े लोग दिखे, वो आदमी दौड़ के उनके पास पहुँचा और उनका झोला अपने हाथों में लिया । वो ऑटो में बैठ ही रहे थे तो मैंने उन्हें रोका, कपड़े से सीट साफ़ की। आदमी के माँ बाप दोनों ऑटो में बैठे , आदमी बग़ल में मेरी ही सीट पे बैठा जहां भैया को बैठना चाहिए था । मेरे परिवार को ना सही, पर किसी के परिवार को अपने ऑटो में बिठा कर, मैं चल पड़ा वापस अस्पताल की ओर।उतरते वक्त उस आदमी के हाथों से टकरा कर डायरी नीचे गिरी, और जिस पन्ने में पेंसिल फँसी थी वहीं खुल गया, आदमी ने उस पन्ने को ध्यान से देखा और मुस्कुराया। “ये तो आपके बाऊजी हैं, चित्र में एकदम हमारे बाऊजी जैसे लगते हैं।” मुझे डायरी लौटायी, मुझसे हाँथ मिलाया फिर गले मिला, मुस्कुराते हुए उसने कदम पीछे लिए। वो अपने माँ-बाप को अपने नवजात बच्चे से मिलाने अस्पताल में अंदर ले गया।
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